मण्डल 1- सूक्त 7

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61. इन्द्रमिद गाथिनो बर्हदिन्द्रमर्केभिरर्किणः |
इन्द्रं वाणीरनूषत ||
सामगान के साधकों ने गाये जाने योग्य बृहत्मास की स्तुतियों से देवराज इंद्र को प्रसन्न किया. इसी तरह यागिकों ने भी मंत्रोचारण के द्वारा इन्द्रदेव की प्रार्थना की है.
62. इन्द्र इद धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा |
इन्द्रो वज्रीहिरण्ययः ||
संयुक्त करने की क्षमता वाले, वज्रधारी, स्वर्णमंडित इन्द्रदेव, वचन मात्र के इशारे से जुड़ जाने वाले अश्वों के साथी हैं.
63. इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद दिवि |
वि गोभिरद्रिमैरयत ||
इन्द्रदेव ने विश्व को प्रकाशित करने के महान उद्देश्य से सूर्यदेव को उच्चाकाश में स्थापित किया, जिनने अपनी किरणों से पर्वत आदि समस्त विश्व को दर्शनार्थ प्रेरित किया.
64. इन्द्र वाजेषु नो.अव सहस्रप्रधनेषु च |
उग्र उग्राभिरूतिभिः ||
हे वीर इन्द्रदेव ! आप सहस्त्रों प्रकार के धन-लाभ वाले छोटे-बड़े संग्रामों में वीरतापूर्वक हमारी रक्षा करें.
65. इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे |
युजं वर्त्रेषु वज्रिणम ||
हम छोटे बड़े सभी संग्रामों में वृत्रासुर के संहारक, वज्रपाणी इन्द्रदेव को सहातार्थ बुलाते है.
66. स नो वर्षन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वर्धि |
अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः ||
सतत दानशील, सदेव अपराजित हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिए मेघ से जल की वृष्टि करें.
67. तुञ्जे-तुञ्जे य उत्तरे सतोमा इन्द्रस्य वज्रिणः |
न विन्धेस्य सुष्टुतिम ||
प्रत्येक दान के समय, वज्रधारी इन्द्रदेव के सदृश्य दान की उपमा अन्यत्र नहीं मिलती. इन्द्रदेव की इससे उत्तम स्तुति करने में हम समर्थ नहीं हैं.
68. वर्षा यूथेव वंसगः कर्ष्टीरियर्त्योजसा |
ईशानो अप्रतिष्कुतः ||
सबके स्वामी, हमारे विरुद्ध कार्य न करने वाले, शक्तिमान इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अनुदान बाँटने के लिए मनुष्यों के पास उसी प्रकार जाते हैं, जैसे वृषभ गायों के समूह में जाता है.
69. य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति |
इन्द्रः पञ्च कसितीनाम ||
इन्द्रदेव पांचो श्रेणी के मनुष्यों(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र और निषाद) और सब ऐश्वर्यों-संपदाओं के अद्वितीय स्वामी हैं.
70. इन्द्रं वो विश्वतस परि हवामहे जनेभ्यः |
अस्माकमस्तु केवलः ||
हे ऋत्विजों ! हे यजमानों ! सभी लोगों में उत्तम, इन्द्रदेव को, आप सबके कल्याण के लिए हम आमंत्रित करते हैं, वे हमारे ऊपर विशेष कृपा करें.