मण्डल 1- सूक्त 12

111. अग्निं दूतं वर्णीमहे होतारं विश्ववेदसम |
अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम ||

* हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! आप यज्ञ के विधाता हैं, समस्त देव शक्तियों को तुष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं. आप यज्ञ की विधि व्यवस्था के स्वामी हैं. ऐसे समर्थ आपको हम देव दूत रूप में स्वीकार करते हैं.

112. अग्निम-अग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम |
हव्यवाहं पुरुप्रियम ||

* प्रजापालक, देवों तक हवी पंहुचाने वाले, परमप्रिय, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! हम याजकगण हवनिये मन्त्रों से सदा आपको बुलाते हैं.

113. अग्ने देवानिहा वह जज्ञानो वर्क्तबर्हिषे |
असि होता न ईड्यः ||

* हे स्तुत्य अग्निदेव ! आप अरणी मंथन से उत्पन्न हुए हैं. आस्तीर्ण कुशाओं पर बैठे हुए यजमान पर अनुग्रह करने हेतु आप यज्ञ की हवी ग्रहण करने वाले देवताओं को इस यज्ञ में बुलाएँ.

114. तानुशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम |
देवैरा सत्सि बर्हिषि ||

* हे अग्निदेव ! आप हवी की कामना करने वाले देवों को यहाँ बुलाएँ और इन कुशा के आसनों पर देवों के साथ प्रितिष्ठित हों.

115. घर्ताहवन दीदिवः परति षम रिषतो दह |
अग्ने तवं रक्षस्विनः ||

* घृत आहुतियों से प्रदीप्त हे अग्निदेव ! आप राक्षसी प्रवर्तीयों वाले शत्रूओं को सम्यक रूप से भस्म करें.

116. अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्ग्र्हपतिर्युवा |
हव्यवाड जुह्वास्यः ||

* यज्ञ स्थल के रक्षक, दूरदर्शी, चिरयुवा, आहुतियों को देवताओं तक पंहुचाने वाले, ज्वालायुक्त आहवनीय यज्ञाग्नि को अरणि मंथन द्वारा उत्पन्न अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है.

117. कविमग्निमुप सतुहि सत्यधर्माणमध्वरे |
देवममीवचातनम ||

* हे ऋत्वजों ! लोक हितकारी यज्ञ में रोगों को नष्ट करने वाले, ज्ञानवान अग्निदेव की स्तुति आप सब विशेष रूप से करें.

118. यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति |
तस्य सम पराविता भव ||

* देवगणों तक हविष्यान्न पंहुचाने वाले हे अग्निदेव ! जो याजक, आप देवदूत की उत्तम विधि से अर्चना करते हैं, आप उनकी भली भांति रक्षा करें.

119. यो अग्निं देववीतये हविष्मानाविवासति |
तस्मै पावक मर्ळय ||

हे शोधक अग्निदेव ! देवों के लिए हवी प्रदान करने वाले जो यजमान आपकी प्रार्थना करते हैं आप उन्हें सुखी बनायें.

120. स नः पावक दीदिवो.अग्ने देवानिहा वह |
उप यज्ञं हविश्च नः ||

* हे पवित्र, दीप्तिवान अग्निदेव ! आप देवों को हमारे यज्ञ में हवी ग्रहण करने के निमित ले आयें.

121. स न सतवान आ भर गायत्रेण नवीयसा |
रयिं वीरवतीमिषम ||

* हे अग्निदेव ! नवीनतम गायत्री छंद वाले सूक्त से स्तुति किये जाते हुए आप हमारे लिए पुत्रादि एश्वर्य और बलयुक्त अन्नों को भरपूर प्रदान करें .

122. अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः |
इमं सतोमं जुषस्व नः ||
* हे अग्निदेव ! अपनी कान्तिमान दिप्तियों से देवों को बुलाने के लिए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें.